काठमांडू से पर्यावरणविद डॉ सुशील द्विवेदी की खास रिपोर्ट

News Status 24 | ब्यूरो काठमांडू (Artificial Intelligence-AI) आज आधुनिक दुनिया की सबसे तेजी से विकसित होने वाली तकनीकों में शामिल है। स्वास्थ्य, शिक्षा, कृषि, उद्योग, रक्षा, अंतरिक्ष, बैंकिंग और मीडिया सहित लगभग हर क्षेत्र में एआई का उपयोग तेजी से बढ़ रहा है। यह तकनीक मानव जीवन को अधिक सुविधाजनक, तेज और प्रभावी बना रही है, लेकिन इसके बढ़ते विस्तार के साथ पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर भी गंभीर चिंताएँ सामने आ रही हैं। पर्यावरणविद डॉ सुशील द्विवेदी का मानना है कि आम लोगों को एआई केवल मोबाइल या कंप्यूटर पर चलने वाली तकनीक दिखाई देती है, जबकि इसके पीछे विशाल डेटा सेंटर, हजारों शक्तिशाली सर्वर और अत्यधिक ऊर्जा की खपत वाली प्रणालियाँ लगातार कार्य करती रहती हैं। एआई मॉडल को प्रशिक्षित (ट्रेनिंग) करने और संचालित करने में भारी मात्रा में बिजली की आवश्यकता होती है। सर्वरों को ठंडा रखने के लिए अत्यधिक पानी और ऊर्जा का उपयोग किया जाता है, जिससे प्राकृतिक संसाधनों पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है।वर्तमान समय में जलवायु परिवर्तन, बढ़ते तापमान, जल संकट और अनियंत्रित शहरीकरण जैसी समस्याओं के बीच एआई का तेजी से विस्तार एक नई पर्यावरणीय चुनौती बनकर उभर रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि एआई स्वयं पानी का उपयोग नहीं करता, बल्कि उसे संचालित करने वाले डेटा सेंटर और कूलिंग सिस्टम बड़ी मात्रा में पानी और बिजली की खपत करते हैं।एआई के बढ़ते उपयोग के साथ नए डेटा सेंटरों की संख्या लगातार बढ़ रही है। इन केंद्रों को संचालित करने के लिए चौबीसों घंटे बिजली की जरूरत होती है, जबकि दुनिया के अनेक देशों में अभी भी बिजली उत्पादन का बड़ा हिस्सा कोयला और अन्य जीवाश्म ईंधनों पर आधारित है। श्री द्विवेदी ने बताया कि ऐसे में एआई का कार्बन उत्सर्जन भी चिंता का विषय बनता जा रहा है।पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार एआई का “एनवायरमेंटल फुटप्रिंट” केवल डेटा सेंटरों तक सीमित नहीं है। इसमें बिजली उत्पादन, जल संसाधनों की खपत, सर्वर निर्माण, इलेक्ट्रॉनिक कचरा (ई-वेस्ट) और आपूर्ति श्रृंखला से जुड़ा प्रदूषण भी शामिल है। जैसे-जैसे जेनरेटिव एआई और बड़े भाषा मॉडल (Large Language Models) का विस्तार होगा, ऊर्जा और प्राकृतिक संसाधनों की मांग भी बढ़ेगी।हालांकि कई बड़ी तकनीकी कंपनियाँ इस चुनौती को कम करने के लिए नवीकरणीय ऊर्जा, वर्षा जल संचयन, जल पुनर्चक्रण, ऊर्जा दक्ष कूलिंग तकनीक और ग्रीन डेटा सेंटर विकसित करने का दावा कर रही हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि केवल दावों से काम नहीं चलेगा, बल्कि पारदर्शिता भी जरूरी है। प्रत्येक बड़े डेटा सेंटर को सार्वजनिक रूप से यह जानकारी देनी चाहिए कि वह कितनी ऊर्जा और पानी का उपयोग करता है तथा पर्यावरण पर उसका वास्तविक प्रभाव कितना है।विशेषज्ञ यह भी सुझाव देते हैं कि सरकारों को डेटा सेंटरों की स्थापना और संचालन के लिए स्पष्ट पर्यावरणीय मानक तय करने चाहिए। ऊर्जा दक्ष तकनीकों को बढ़ावा देने, अक्षय ऊर्जा के उपयोग को अनिवार्य बनाने और जल संरक्षण को प्राथमिकता देने की आवश्यकता है।पर्यावरणविद् डॉ. सुशील द्विवेदी का कहना है कि एआई मानव सभ्यता की सबसे शक्तिशाली तकनीकों में से एक है, लेकिन इसका विकास पर्यावरण की कीमत पर नहीं होना चाहिए। उनका मानना है कि डिजिटल विकास तभी सार्थक होगा, जब तकनीकी प्रगति के साथ पृथ्वी, जल और प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण भी समान प्राथमिकता प्राप्त करे।उन्होंने कहा कि भविष्य की तकनीक वही होगी जो कम ऊर्जा, कम पानी और अधिक दक्षता के साथ कार्य करे। एआई को केवल तकनीकी उपलब्धि के रूप में नहीं, बल्कि पर्यावरणीय जिम्मेदारी के साथ विकसित करना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। यही संतुलन आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित और टिकाऊ विकास का आधार बनेगा। News Status 24 पूरी करे सच की जिज्ञासा,
