
न्यूज स्टेटस 24 , डॉ सुशील द्विवेदी, काठमांडू नेपाल । नेपाल-तिब्बत सीमा क्षेत्र में 26 अगस्त को ग्लेशियर और बर्फ-पत्थर के ढहने के बाद आई विनाशकारी बाढ़ का खतरा अभी पूरी तरह टला नहीं है। आपदा के बाद ऊपरी क्षेत्र में नदी का मार्ग मलबे से अवरुद्ध होने के कारण एक नई झील बनने की सूचना सामने आई है। सैटेलाइट तस्वीरों और प्रारंभिक आकलन के अनुसार झील का आकार बढ़ रहा है और इसके अचानक टूटने की स्थिति में एक और तेज बाढ़ की आशंका जताई गई है। पर्यावरणविद् डॉ. सुशील द्विवेदी ने इस स्थिति को गंभीर चेतावनी बताते हुए कहा कि “खतरा अभी टला नहीं है। उत्तरी बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश को विशेष रूप से सतर्क रहने की जरूरत है।”उन्होंने कहा कि हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियर टूटने, मलबे से नदी का रास्ता रुकने और उसके पीछे पानी जमा होने की घटनाएं अचानक बड़े जलप्रवाह का रूप ले सकती हैं। ऐसी स्थिति में नीचे की ओर बसे क्षेत्रों को बहुत कम समय में खतरे का सामना करना पड़ सकता है।गंडक नदी पर विशेष नजर जरूरी नेपाल की नदियों का प्रवाह भारत में आने के बाद विशेष रूप से गंडक नदी प्रणाली से जुड़ता है। नेपाल की त्रिशूली नदी आगे चलकर नारायणी और फिर भारत में गंडक के रूप में बहती है। यही वजह है कि नेपाल में ऊपरी क्षेत्र में होने वाली बड़ी जल संबंधी घटना का असर बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश तक पहुंच सकता है। केंद्र सरकार ने भी नेपाल की आपदा को देखते हुए बिहार और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्रियों से संपर्क किया है तथा सीमावर्ती संभावित प्रभावित क्षेत्रों में प्रशासन और NDRF को हाई अलर्ट पर रखा गया है। बिहार के पश्चिमी चंपारण, पूर्वी चंपारण, गोपालगंज, सारण, मुजफ्फरपुर और वैशाली सहित गंडक नदी से जुड़े क्षेत्रों में निगरानी बढ़ाई गई है। वहीं उत्तर प्रदेश में महराजगंज और कुशीनगर जैसे सीमावर्ती जिलों में भी प्रशासन को सतर्क रहने के निर्देश दिए गए हैं। घबराने की नहीं, सतर्क रहने की जरूरतहालांकि NDRF ने 28 अगस्त को बताया है कि नेपाल की ग्लेशियल बाढ़ का भारतीय क्षेत्र में फिलहाल कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ा है। इसके बावजूद नई बनी झील और ऊपरी हिमालय में लगातार बदलती परिस्थितियों को देखते हुए निगरानी बेहद महत्वपूर्ण है। डॉ. सुशील द्विवेदी ने प्रशासन से अपील की कि नदी किनारे और निचले इलाकों में रहने वाले लोगों को समय रहते सूचना दी जाए, तटबंधों की निगरानी बढ़ाई जाए और आपात स्थिति में सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने की व्यवस्था पहले से तैयार रखी जाए।उन्होंने कहा कि “हिमालय में होने वाली प्राकृतिक घटनाओं का असर सीमाओं तक सीमित नहीं रहता। नेपाल में खतरा पैदा होता है तो उसका प्रभाव भारत की नदियों और मैदानी इलाकों तक पहुंच सकता है। इसलिए अभी सबसे जरूरी है—सतर्कता, निगरानी और समय पर चेतावनी।”— डॉ. सुशील द्विवेदी, पर्यावरणविद्
