
न्यूज स्टेटस 24, ब्यूरो कानपुर।केवल ब्राह्मण एकता के लिए कार्य करना अपने-आप में जातिवाद नहीं है। यह इस बात पर निर्भर करता है कि उस कार्य का उद्देश्य और तरीका क्या है।यदि ब्राह्मण समाज में शिक्षा, संगठन और सामाजिक जागरूकता बढ़ाना हो,आर्थिक रूप से कमजोर लोगों की सहायता करना हो,सांस्कृतिक और वैदिक परंपराओं का संरक्षण करना हो,समाज सेवा और राष्ट्रहित में योगदान देना हो,तो इसे सामाजिक संगठन या समुदाय विकास का कार्य माना जा सकता है।लेकिन यदि दूसरी जातियों को नीचा दिखाना,उनके प्रति घृणा या भेदभाव फैलाना,समाज में वैमनस्य पैदा करना तो वह जातिवाद की श्रेणी में आ सकता है और सामाजिक सौहार्द के लिए उचित नहीं माना जाएगा।भारत में विभिन्न समुदायों—जैसे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, जाट, गुर्जर, यादव, दलित, सिख, जैन आदि—के अपने-अपने सामाजिक संगठन हैं, जो शिक्षा, सेवा, सांस्कृतिक संरक्षण और सामुदायिक सहयोग के लिए कार्य करते हैं। ऐसे संगठन तब तक सामान्य सामाजिक गतिविधि माने जाते हैं, जब तक वे संविधान के मूल्यों, समानता और सामाजिक सद्भाव का सम्मान करते हैं।इसलिए कहा जा सकता है कि “ब्राह्मण एकता” यदि समाज सेवा, शिक्षा, सांस्कृतिक संरक्षण और राष्ट्रहित के लिए है, तो उसे केवल जातिवाद कहना उचित नहीं होगा। वहीं, यदि उसका आधार दूसरों के प्रति भेदभाव या वैमनस्य है, तो वह जातिवाद माना जा सकता है।News Status 24 पूरी करे सच की जिज्ञासा ✍🏼
