
न्यूज स्टेटस 24,लखनऊ ब्यूरो। पिछले दो दिनों से लगातार हो रही बारिश ने विभिन्न शहरों की नगर व्यवस्थाओं की पोल खोलकर रख दी है। कई मोहल्ले और गलियां तालाब में तब्दील हो गई हैं। गंदे नालों का पानी सड़कों से होते हुए लोगों के घरों तक पहुंच गया। पानी उतरने के बाद पीछे गंदगी का अंबार छोड़ गया, लेकिन सवाल आज भी वही है—आखिर इसका दोषी कौन है? जनता, जनप्रतिनिधि या अधिकारी? ब्राह्मण स्वयंसेवक संघ के संयोजक अरविंद कुमार तिवारी ने कहा कि वर्षों से विकास और स्मार्ट सिटी के बड़े-बड़े दावे किए जाते रहे हैं। छोटे नेताओं से लेकर शीर्ष जनप्रतिनिधियों तक विकास का गुणगान सुनाई देता है, लेकिन एक सामान्य बारिश ने इन दावों की वास्तविकता सामने ला दी। लोगों का जनजीवन अस्त-व्यस्त हो गया, जबकि अधिकांश जिम्मेदार जनप्रतिनिधि और अधिकारी जनता के बीच दिखाई नहीं दिए।उन्होंने कहा कि कुछ सभासद और स्थानीय जनप्रतिनिधि जरूर क्षेत्र में सक्रिय हैं तथा सोशल मीडिया के माध्यम से अपनी उपस्थिति भी दर्ज करा रहे हैं। वहीं कई जनप्रतिनिधि स्वयं यह शिकायत कर रहे हैं कि अधिकारी उनकी बात नहीं सुनते और केवल औपचारिक निरीक्षण करके चले जाते हैं। श्री तिवारी ने सवाल उठाया कि यदि स्मार्ट सिटी के नाम पर वर्षों से सफाई और जल निकासी व्यवस्था पर करोड़ों-अरबों रुपये खर्च किए गए हैं, तो फिर हर बारिश में शहर जलमग्न क्यों हो जाता है? उन्होंने कटाक्ष करते हुए कहा कि यह समझना कठिन है कि सफाई नालों की हुई या स्मार्ट सिटी के बजट की।उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार के अधिकारियों ने कभी नागरिकों से स्मार्ट सिटी के लिए सुझाव भी लिए थे। लोगों को उम्मीद थी कि शहरों की मूलभूत सुविधाओं में सुधार होगा, लेकिन आज भी फुटपाथ अतिक्रमण से घिरे हैं, नालों को पक्का ढक दिया गया है और पॉलिथीन व कचरे के कारण जल निकासी व्यवस्था पूरी तरह बाधित हो जाती है।अरविंद तिवारी ने कहा कि आम नागरिक नियमित रूप से हाउस टैक्स, रोड टैक्स और अन्य करों का भुगतान करता है। ऐसे में नालियों की सफाई, अतिक्रमण हटाना और जल निकासी व्यवस्था दुरुस्त करना उसकी जिम्मेदारी नहीं बल्कि प्रशासन और स्थानीय निकायों का दायित्व है।उन्होंने कहा कि जनता अपने प्रतिनिधियों को इस विश्वास के साथ चुनती है कि वे उसकी समस्याओं का समाधान करेंगे। यदि जनप्रतिनिधियों की बात अधिकारी नहीं सुन रहे हैं, तो यह प्रशासनिक व्यवस्था की कमजोरी है। आम नागरिक तो अधिकारी के कार्यालय में जाने से भी संकोच करता है, जबकि जनप्रतिनिधियों को जनता की ओर से प्रभावी ढंग से आवाज उठानी चाहिए।उन्होंने कहा कि किसी भी आपदा का समय रहते आकलन कर उसके बचाव की तैयारी करना प्रशासन का दायित्व है। केवल निरीक्षण, प्रचार और सोशल मीडिया पर उपलब्धियां गिनाने से समस्याओं का समाधान नहीं होगा। विकास केवल नए निर्माण तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि व्यवस्थाओं के रखरखाव और सुधार पर भी समान रूप से ध्यान देना होगा।अरविंद तिवारी ने कहा कि यदि कोई अधिकारी जनहित में कार्य नहीं कर रहा है तो उसके विरुद्ध समय रहते प्रभावी कार्रवाई और विरोध होना चाहिए। उन्होंने कहा कि सरकार की नीतियां तभी सफल होंगी, जब अधिकारी और जनप्रतिनिधि मिलकर उन्हें ईमानदारी से धरातल पर लागू करेंगे।उन्होंने अंत में कहा कि जनता की अपेक्षाएं लगातार बढ़ रही हैं। यदि मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध नहीं होंगी तो केवल विकास के दावे करने से लोगों का विश्वास नहीं जीता जा सकता। सरकार के शीर्ष स्तर पर नीतियां और बजट उपलब्ध कराए जा सकते हैं, लेकिन उनका प्रभावी क्रियान्वयन स्थानीय स्तर पर ही सुनिश्चित करना होगा। इसलिए समय आ गया है कि आम नागरिक की आवाज को प्राथमिकता दी जाए और नगर व्यवस्था को वास्तव में जनहितकारी बनाया जाए।(यह टिप्पणी ब्राह्मण स्वयंसेवक संघ के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद कुमार तिवारी द्वारा व्यक्त विचारों पर आधारित है। News Status 24
