संपादकीय : विवेक द्विवेदी News Status 24

राजनीति में अक्सर कहा जाता है कि सत्ता और पद की चाह इंसान को अपने-पराये का फर्क भुला देती है। पश्चिम बंगाल की राजनीति में इन दिनों कुछ ऐसे ही हालात देखने को मिल रहे हैं। जिन नेताओं को कभी मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का सबसे करीबी माना जाता था, आज उन्हीं में से कई चेहरे उनके लिए राजनीतिक चुनौती बनते नजर आ रहे हैं।तृणमूल कांग्रेस की स्थापना से लेकर सत्ता के शिखर तक पहुंचने के सफर में ममता बनर्जी ने अनेक नेताओं को आगे बढ़ाया, संगठन और सरकार में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां दीं। लेकिन समय के साथ कई सहयोगी या तो पार्टी से अलग हो गए या फिर नेतृत्व के खिलाफ मुखर दिखाई देने लगे।राजनीतिक जानकारों का मानना है कि सत्ता के केंद्र में रहते हुए महत्वाकांक्षाओं का टकराव स्वाभाविक है। जब व्यक्तिगत राजनीतिक भविष्य और पद की संभावनाएं बढ़ती हैं, तो कई बार वर्षों पुराने रिश्ते और निष्ठाएं भी कमजोर पड़ जाती हैं।इसी संदर्भ में राजनीतिक गलियारों में एक कहावत खूब चर्चा में है कि “जिन्हें शुद्ध घी का हलुआ खिलाया, आज उन्हीं से ज़हर का प्याला मिल रहा है।” हालांकि यह एक राजनीतिक टिप्पणी है, लेकिन बंगाल की मौजूदा परिस्थितियों पर इसे जोड़कर देखा जा रहा है।विशेषज्ञों का कहना है कि लोकतंत्र में मतभेद और असहमति सामान्य प्रक्रिया है, लेकिन जब सहयोगी ही विरोधी खेमे में खड़े दिखाई देने लगें तो यह किसी भी राजनीतिक दल और नेतृत्व के लिए चिंता का विषय बन जाता है।फिलहाल पश्चिम बंगाल की राजनीति में बदलते समीकरणों ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि सत्ता के गलियारों में न तो कोई स्थायी मित्र होता है और न ही स्थायी शत्रु। यहां परिस्थितियों के साथ रिश्तों और समीकरणों का बदलना एक सामान्य राजनीतिक प्रक्रिया मानी जाती है।News Status 24 – विवेक द्विवेदी, संपादक
