
भारत गांवों का देश है। गांव की सड़कें, पेयजल, शिक्षा, स्वास्थ्य, सिंचाई और किसानों की आजीविका ही किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की वास्तविक कसौटी होती हैं। लेकिन आज विडंबना यह है कि इन मूलभूत समस्याओं की चर्चा धीरे-धीरे सार्वजनिक विमर्श से गायब होती जा रही है।किसी गांव की सड़क वर्षों से टूटी पड़ी है। लोग गंदे और असुरक्षित रास्तों से गुजरने को मजबूर हैं। पेयजल की समस्या इतनी गंभीर है कि महिलाओं और बच्चों को रोजाना दूर-दूर तक पानी के लिए भटकना पड़ता है। सरकारी विद्यालयों में शिक्षकों की कमी के कारण बच्चों का भविष्य प्रभावित हो रहा है। अस्पतालों में डॉक्टरों और दवाओं का अभाव है। किसानों को फसल क्षति का मुआवजा समय पर नहीं मिल रहा। विकास कार्य अधूरे पड़े हैं और आम नागरिक बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहा है।इन गंभीर मुद्दों पर व्यापक चर्चा होनी चाहिए थी। जनप्रतिनिधियों से सवाल पूछे जाने चाहिए थे कि विकास की योजनाएँ जमीन पर क्यों नहीं उतर रहीं। लेकिन दुर्भाग्य से राजनीतिक संवाद का केंद्र अब विकास नहीं, बल्कि जातीय पहचान बनता जा रहा है।आज चुनावी चर्चाओं में अक्सर यह सुनाई देता है—“हमारी जाति का विधायक होना चाहिए”, “हमारी जाति का सांसद होना चाहिए।” मानो प्रतिनिधि की योग्यता, ईमानदारी और कार्यक्षमता से अधिक उसकी जाति महत्वपूर्ण हो गई हो। लोकतंत्र का उद्देश्य समाज को जोड़ना था, लेकिन जातिवाद की संकीर्ण सोच उसे विभाजित कर रही है।स्थिति और चिंताजनक तब हो जाती है जब सत्ता पक्ष के साथ-साथ विपक्ष भी रचनात्मक भूमिका निभाने के बजाय आरोप-प्रत्यारोप, जातीय कटाक्ष और धार्मिक टिप्पणियों में उलझ जाता है। विकास की चर्चा पीछे छूट जाती है और समाज को बांटने वाली भाषा प्रमुख हो जाती है। किसी महापुरुष, किसी धर्म या किसी समुदाय को अपमानित करके राजनीतिक लाभ लेने की प्रवृत्ति लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं है।राजनीति का मूल उद्देश्य जनता की समस्याओं का समाधान होना चाहिए। सड़क, पानी, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और किसानों की समृद्धि ही किसी भी जनप्रतिनिधि की प्राथमिकता होनी चाहिए। यदि राजनीति केवल जातीय समीकरणों और भावनात्मक ध्रुवीकरण तक सीमित हो जाएगी, तो समाज का समग्र विकास बाधित होगा।आज आवश्यकता इस बात की है कि मतदाता जाति से ऊपर उठकर ऐसे प्रतिनिधियों का चयन करें जो काम करें, जवाबदेह हों और विकास को प्राथमिकता दें। साथ ही सत्ता और विपक्ष दोनों को यह समझना होगा कि लोकतंत्र की सफलता समाज को बांटने में नहीं, बल्कि समस्याओं का समाधान करने में है।यदि हम अब भी नहीं चेते, तो आने वाली पीढ़ियाँ यह प्रश्न अवश्य पूछेंगी कि जब सड़कें टूटी थीं, स्कूलों में शिक्षक नहीं थे, अस्पतालों में उपचार नहीं था और किसान परेशान थे, तब राजनीति किस मुद्दे पर हो रही थी।लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति जाति आधारित पहचान में नहीं, बल्कि जनकल्याण और विकास के संकल्प में निहित है।– विवेक द्विवेदी , संपादक, News Status 24“पूरी करे सच की जिज्ञासा” ✍🏼7007725435 व्हाट्सअप
