
न्यूज स्टेटस 24, विवेक द्विवेदी ( कोलकाता)। पश्चिम बंगाल की राजनीति में उस समय बड़ा संवैधानिक और राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया, जब सोशल मीडिया पर यह दावा तेजी से वायरल होने लगा कि राज्यपाल ने अपने विशेष अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए राज्य विधानसभा को भंग कर दिया है। इस दावे के बाद राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज हो गई और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की सरकार को लेकर चर्चाओं का दौर शुरू हो गया।हालांकि संवैधानिक विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी राज्य में विधानसभा भंग करने की प्रक्रिया बेहद संवेदनशील और कानूनी प्रावधानों से बंधी होती है। सामान्य परिस्थितियों में राज्यपाल मुख्यमंत्री और मंत्रिपरिषद की सलाह पर ही निर्णय लेते हैं। केवल विशेष संवैधानिक संकट की स्थिति में ही केंद्र सरकार और राष्ट्रपति की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।वायरल दावों में अनुच्छेद 174(2)(b) का हवाला दिया जा रहा है, जिसके तहत राज्यपाल विधानसभा को भंग कर सकते हैं। लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार इस शक्ति का प्रयोग स्वतंत्र रूप से करना व्यवहारिक और संवैधानिक रूप से विवादित माना जाता है। किसी भी ऐसे फैसले को अदालत में चुनौती दी जा सकती है।राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बंगाल में लंबे समय से राज्य सरकार और राज्यपाल के बीच टकराव की स्थिति बनी हुई है। कानून-व्यवस्था, विश्वविद्यालयों की नियुक्तियों और प्रशासनिक फैसलों को लेकर दोनों पक्षों में कई बार खुला विवाद सामने आ चुका है। ऐसे में इस प्रकार की खबरों ने राजनीतिक माहौल को और गर्म कर दिया है।तृणमूल कांग्रेस के नेताओं ने वायरल दावों को “भ्रामक और अफवाह” बताया है, जबकि विपक्षी दल इसे राज्य की राजनीतिक अस्थिरता से जोड़कर देख रहे हैं। सोशल मीडिया पर भी लोग दो धड़ों में बंटे नजर आए—एक पक्ष इसे लोकतंत्र पर हमला बता रहा है तो दूसरा इसे संवैधानिक अधिकारों का प्रयोग कह रहा है।फिलहाल इस मामले में कोई आधिकारिक अधिसूचना सामने नहीं आई है। विशेषज्ञों की सलाह है कि लोग सोशल मीडिया पर वायरल हो रही खबरों पर तुरंत विश्वास न करें और केवल आधिकारिक स्रोतों से जारी जानकारी पर ही भरोसा करें।
