
नीरज त्रिपाठी , चेयरमैन S R PUBLIC SCHOOL
न्यूज स्टेटस 24 – आज का समय प्रतिस्पर्धा, आधुनिक शिक्षा और तकनीक का दौर है। हर माता-पिता चाहते हैं कि उनका बच्चा अंग्रेज़ी माध्यम में पढ़े, आधुनिक बने और दुनिया के साथ कदम से कदम मिलाकर चले। लेकिन इसी दौड़ में एक चिंता भी लगातार बढ़ रही है—क्या बच्चे अपनी संस्कृति, संस्कार और सनातन मूल्यों से दूर होते जा रहे हैं?यह चिंता केवल परंपरावादियों की नहीं, बल्कि उन परिवारों की भी है जो आधुनिक शिक्षा के साथ भारतीयता को बचाए रखना चाहते हैं। सवाल यह नहीं है कि इंग्लिश मीडियम गलत है या सही, बल्कि सवाल यह है कि क्या आधुनिक शिक्षा के साथ सनातन संस्कृति और संस्कारों का संतुलन बनाया जा सकता है? जवाब है—हाँ, बिल्कुल।भाषा नहीं, वातावरण संस्कार देता है संस्कार किसी भाषा के मोहताज नहीं होते। बच्चा अंग्रेज़ी बोले या हिंदी, यदि उसके घर का वातावरण भारतीय संस्कृति से जुड़ा होगा तो वह अपने मूल्यों को कभी नहीं भूलेगा। आज कई ऐसे परिवार हैं जहां बच्चे इंग्लिश मीडियम में पढ़ते हैं, लेकिन सुबह घर में “ॐ” की ध्वनि, मंदिर की आरती, बड़ों का सम्मान और भारतीय परंपराओं का पालन देखते हुए बड़े होते हैं।बच्चे वही सीखते हैं जो वे रोज़ देखते हैं। यदि माता-पिता स्वयं भारतीय संस्कृति को सम्मान देंगे, तो बच्चा भी उसे अपनाएगा।कहानी और परंपरा से जोड़ना होगा आज के बच्चों को उपदेश कम और उदाहरण ज्यादा प्रभावित करते हैं। रामायण, महाभारत, श्रीकृष्ण, शिवाजी महाराज, गुरु गोविंद सिंह और स्वामी विवेकानंद जैसे महापुरुषों की कहानियां बच्चों के भीतर नैतिकता और आत्मविश्वास दोनों पैदा करती हैं।जरूरी नहीं कि यह शिक्षा केवल धार्मिक रूप में दी जाए। इसे प्रेरणादायक जीवन मूल्यों के रूप में भी समझाया जा सकता है—जैसे सत्य, साहस, अनुशासन, सेवा और माता-पिता का सम्मान।त्योहार केवल छुट्टी नहीं, सीख का माध्यम बनें आज कई बच्चों के लिए दीपावली केवल पटाखे और होली केवल रंगों का त्योहार बनकर रह गई है। जबकि भारतीय पर्वों के पीछे गहरा सामाजिक और आध्यात्मिक संदेश छिपा है।यदि माता-पिता बच्चों को त्योहारों का महत्व समझाएं—जैसे दीपावली अंधकार पर प्रकाश की विजय का प्रतीक है, रक्षाबंधन सुरक्षा और विश्वास का पर्व है—तो बच्चा त्योहारों को केवल उत्सव नहीं बल्कि संस्कृति के रूप में समझेगा।तकनीक का सही उपयोग जरूरी आज का बच्चा मोबाइल और इंटरनेट से दूर नहीं रह सकता। इसलिए जरूरत इस बात की है कि तकनीक को विरोधी नहीं, सहयोगी बनाया जाए। बच्चों को ऐसे वीडियो, ऑडियो, एनिमेशन और पुस्तकों से जोड़ा जा सकता है जो भारतीय संस्कृति और सनातन विचारों को आधुनिक तरीके से प्रस्तुत करते हों।कई डिजिटल प्लेटफॉर्म अब बच्चों के लिए संस्कार आधारित कंटेंट तैयार कर रहे हैं। यदि परिवार थोड़ा ध्यान दे, तो मोबाइल भी शिक्षा और संस्कार का माध्यम बन सकता है।स्कूल नहीं, परिवार सबसे बड़ा विद्यालय संस्कारों की शुरुआत घर से होती है। यदि बच्चा देखे कि परिवार में बड़ों का सम्मान होता है, भोजन से पहले ईश्वर को याद किया जाता है, जरूरतमंदों की मदद की जाती है और सत्य बोलने की प्रेरणा दी जाती है, तो वह स्वतः इन मूल्यों को अपनाने लगता है।इंग्लिश मीडियम शिक्षा आधुनिक जीवन के लिए जरूरी हो सकती है, लेकिन भारतीय संस्कार जीवन को दिशा देते हैं। दोनों का संतुलन ही एक आदर्श पीढ़ी तैयार कर सकता है।निष्कर्ष आधुनिकता और सनातन एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। आवश्यकता केवल इस बात की है कि हम बच्चों को “केवल सफल” नहीं बल्कि “संस्कारवान” भी बनाएं। अंग्रेज़ी सीखना गलत नहीं, अपनी जड़ों को भूल जाना गलत है।यदि परिवार, समाज और शिक्षा मिलकर प्रयास करें तो आने वाली पीढ़ी आधुनिक भी होगी और भारतीय संस्कृति से जुड़ी हुई भी। यही सनातन की वास्तविक शक्ति है—समय के साथ चलना, लेकिन अपनी आत्मा को बचाए रखना। न्यूज स्टेटस 24,पूरी करे सच की जिज्ञासा
