
संपादकीय टिप्पणी – धर्म का उद्देश्य विवाद नहीं बल्कि श्रद्धा और कर्तव्य है । शास्त्रों का मर्म यही है कि अंतिम संस्कार सम्मानपूर्वक और विधि विधान से सम्पन्न हो इसलिए किसी घटना को बाहरी रूप से नहीं बल्कि उसके धार्मिक और मानवीय संबंध में समझना चाहिए – विवेक द्विवेदी ।
न्यूज स्टेटस 24 ✍🏼समाजवादी परिवार के सदस्य प्रतीक यादव के अंतिम संस्कार से जुड़ी एक बात ने लोगों के मन में कई सवाल खड़े कर दिए। चर्चा इस बात की है कि उनके अंतिम संस्कार में मुखाग्नि उनके पिता, भाई या पुत्र ने नहीं, बल्कि उनके ससुर ने दी। इसके बाद सोशल मीडिया से लेकर आम जनमानस तक एक प्रश्न लगातार उठ रहा है—क्या हिंदू धर्मशास्त्रों में ससुर द्वारा मुखाग्नि देना मान्य है? क्या यह परंपरा के विरुद्ध है? और इस विषय पर विद्वान पंडितों की क्या राय है?आज इसी विषय पर तथ्य, परंपरा और शास्त्रों के आधार पर चर्चा।हिंदू धर्म में अंतिम संस्कार केवल एक सामाजिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि अत्यंत महत्वपूर्ण धार्मिक संस्कार माना जाता है। इसे अन्त्येष्टि कहा जाता है, जो सोलह संस्कारों में अंतिम संस्कार है। परंपरागत रूप से मुखाग्नि देने का प्रथम अधिकार ज्येष्ठ पुत्र को दिया गया है। यदि पुत्र न हो, तो अन्य पुत्र, पौत्र, भाई या अन्य निकट संबंधी यह कर्तव्य निभाते हैं।लेकिन क्या शास्त्र केवल इन्हीं तक सीमित हैं? इसका उत्तर है—नहीं।धर्मशास्त्रों और गरुड़ पुराण की व्याख्या करने वाले अनेक आचार्यों का मत है कि अंतिम संस्कार का मूल उद्देश्य मृतक के प्रति श्रद्धा, सम्मान और विधिपूर्वक कर्म संपन्न करना है। यदि किसी विशेष परिस्थिति में परिवार की सहमति हो और कुल पुरोहित मार्गदर्शन दें, तो कोई निकट संबंधी या जिम्मेदारी लेने वाला व्यक्ति भी मुखाग्नि दे सकता है।यहीं से ससुर की भूमिका पर चर्चा आती है।सामान्य परंपरा में ससुर को मुखाग्नि देने का प्राथमिक अधिकार नहीं माना जाता, क्योंकि वे रक्त संबंधी नहीं होते। लेकिन धर्म के जानकारों का कहना है कि यदि परिवार की इच्छा, परिस्थितियों की आवश्यकता और पुरोहित की अनुमति हो, तो ससुर द्वारा मुखाग्नि देना शास्त्र-विरुद्ध नहीं माना जाता।कई विद्वान पंडित स्पष्ट रूप से कहते हैं कि धर्म का सार कठोर औपचारिकता नहीं, बल्कि श्रद्धा और कर्तव्य में है। यदि किसी ने सच्चे मन से अंतिम संस्कार का दायित्व निभाया है, तो उसे धार्मिक दृष्टि से अमान्य नहीं कहा जा सकता।यह भी ध्यान देने योग्य है कि बदलते समय के साथ अंतिम संस्कार की परंपराओं में कई परिवर्तन हुए हैं। आज बेटियाँ मुखाग्नि दे रही हैं, पत्नियाँ अंतिम संस्कार कर रही हैं, और अनेक अवसरों पर परिवार की सहमति से अन्य संबंधी भी यह दायित्व निभाते हैं। इसलिए केवल परंपरा के पुराने स्वरूप के आधार पर किसी घटना को शास्त्र-विरुद्ध घोषित कर देना उचित नहीं होगा।यदि प्रतीक यादव के अंतिम संस्कार में उनके ससुर ने परिवार की सहमति और पुरोहितों के निर्देश में मुखाग्नि दी, तो धर्मशास्त्रों की भावना के अनुसार इसे अनुचित नहीं कहा जा सकता।अंततः प्रश्न यह नहीं है कि मुखाग्नि किसने दी। वास्तविक प्रश्न यह है कि क्या अंतिम संस्कार श्रद्धा, सम्मान और विधि-विधान के साथ संपन्न हुआ। यदि उत्तर हाँ है, तो धर्म की मूल भावना भी पूरी हुई। पढ़ते रहिए News Status 24 , पूरी करे सच की जिज्ञासा।
