News Status 24 “पूरी करे सच की जिज्ञासा” संपादक – विवेक द्विवेदी
भाजपा की राजनीतिक रणनीति: धैर्य, समय और सत्ता का खेल2013 में जब से भारतीय राजनीति में Narendra Modi का दौर शुरू हुआ, तभी से देश की राजनीति में एक बड़ा बदलाव देखने को मिला। इस दौर में भारतीय जनता पार्टी की राजनीतिक रणनीतियों ने विपक्षी दलों के लिए चुनावी और संगठनात्मक राजनीति को बेहद कठिन बना दिया है।अगर हालिया यूजीसी विवाद को छोड़ दिया जाए, तो पिछले लगभग तेरह वर्षों में भाजपा की अधिकांश राजनीतिक रणनीतियाँ काफी हद तक सफल साबित हुई हैं। यही वजह है कि पार्टी की ताकत लगातार बढ़ती गई है। जिन राज्यों में कभी भाजपा का नाम लेना भी मुश्किल माना जाता था, वहाँ पार्टी ने पहले गठबंधन के सहारे सत्ता में प्रवेश किया, फिर धीरे-धीरे सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी और अंततः अपना मुख्यमंत्री भी स्थापित कर दिया।दरअसल राजनीति में आदर्शों और सिद्धांतों की चर्चा भले ही होती रहे, लेकिन हर राजनीतिक दल का अंतिम लक्ष्य सत्ता प्राप्त करना ही होता है। इस लक्ष्य को हासिल करने की कला में भाजपा ने असाधारण दक्षता हासिल कर ली है।धैर्य और समय का इंतजार भाजपा की सबसे बड़ी खासियत यह है कि वह राजनीति में धैर्य के साथ काम करना जानती है। पार्टी अक्सर मौके को पकने देती है और जल्दबाज़ी में कोई बड़ा कदम उठाने से बचती है।इसके उलट महाराष्ट्र की राजनीति में Uddhav Thackeray का राजनीतिक उतार भी इसी जल्दबाज़ी का उदाहरण माना जाता है। चुनाव में अपेक्षा से कम सीटें मिलने के बावजूद उन्होंने मुख्यमंत्री बनने की जिद पकड़ी और वैचारिक रूप से अलग दलों के साथ मिलकर सरकार बना ली। सत्ता तो मिल गई, लेकिन अंततः न कुर्सी बची और न ही पार्टी पर उनका पूरा नियंत्रण।अगर उस समय उन्होंने थोड़ा राजनीतिक धैर्य दिखाया होता, तो परिस्थितियाँ बिल्कुल अलग हो सकती थीं। उनका बेटा Aaditya Thackeray उपमुख्यमंत्री की भूमिका में होता, जबकि वे स्वयं राष्ट्रीय राजनीति में प्रभावशाली भूमिका निभा सकते थे।“काँटे से काँटा” निकालने की रणनीतिमहाराष्ट्र की राजनीति में भाजपा ने बेहद चतुराई से “काँटे से काँटा निकालने” की रणनीति अपनाई। पार्टी ने Eknath Shinde को उद्धव ठाकरे से अलग किया और Ajit Pawar को Sharad Pawar से अलग करके सत्ता समीकरण बदल दिए।उस समय Devendra Fadnavis ने राजनीतिक संयम दिखाते हुए मुख्यमंत्री पद शिंदे को सौंप दिया और स्वयं उपमुख्यमंत्री बन गए। लेकिन बाद के चुनावी हालात बदलते ही वे फिर से मुख्यमंत्री पद तक पहुँचने में सफल रहे।बिहार में भी वही रणनीति कुछ ऐसी ही रणनीति बिहार की राजनीति में भी देखने को मिली। दो चुनावों में भाजपा को Nitish Kumar की पार्टी Janata Dal (United) से अधिक सीटें मिलने के बावजूद भाजपा ने मुख्यमंत्री पद को लेकर कोई जल्दबाज़ी नहीं दिखाई।पार्टी को यह अहसास था कि यदि नेतृत्व बदलने की कोशिश की गई, तो नीतीश कुमार तुरंत Lalu Prasad Yadav के साथ हाथ मिला सकते हैं। इसलिए भाजपा ने नीतीश के नेतृत्व को स्वीकार करते हुए सही समय का इंतजार करना ही बेहतर समझा।राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जेडीयू के पास नीतीश कुमार के अलावा कोई मजबूत मुख्यमंत्री चेहरा नहीं है। ऐसे में समय के साथ उनकी राजनीतिक पकड़ कमजोर होने पर भाजपा का नेतृत्व उभरना लगभग तय माना जा रहा है।बिहार की राजनीति का अगला अध्याय जहाँ तक Tejashwi Yadav का सवाल है, उनकी वर्तमान राजनीतिक शैली को देखते हुए यह कहना अभी कठिन है कि बिहार की जनता इतनी जल्दी उनके नेतृत्व को पूरी तरह स्वीकार करेगी।एक समय था जब 1990 से 2005 तक बिहार की राजनीति में लालू प्रसाद यादव का दबदबा रहा। उस दौर में अक्सर यह सवाल उठता था कि बिहार की जनता बार-बार उसी नेतृत्व को क्यों चुनती है। लेकिन उसके बाद के दो दशकों में राजनीतिक तस्वीर बदल गई।बिहार के मतदाताओं ने “जंगलराज” की वापसी को दोहराने से बचते हुए लगातार तीन लोकसभा चुनावों में Narendra Modi के नेतृत्व को भरपूर समर्थन दिया। इससे यह साफ होता है कि बिहार का मतदाता अपने हित और अनहित को समझने की क्षमता रखता है।अब असली सवाल यह है कि लालू युग और नीतीश काल के बाद बिहार की राजनीति में अगला निर्णायक अध्याय किस नेता के नाम लिखा जाएगा। आने वाले वर्षों में यही सवाल राज्य की राजनीति का सबसे बड़ा केंद्र बनने वाला है।
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