
मैं विद्यार्थी जीवन में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखा के प्रति जब आकर्षित हुए तो वहां देखा कि वहां उपस्थित सभी स्वयं सेवकों के नाम के अन्त में जी लगाकर एक दूसरे को पुकार रहे थे, सरनेम (जातीय पहचान) लगाकर किसी को भी नहीं पुकारते ! तब वहां जाकर बड़ा अच्छा लगा था,क्योंकि वहां कोई जातिगत विभेद नहीं था ! कोई अगड़ा पिछड़ा दलित नहीं था ! छुआ छूत दूर दूर तक दिखाई नहीं देती थी ? सब मिलकर शारीरिक व्यायाम
साक्षात्कार : शिव नारायण तिवारी (हमीरपुर) , पूर्व जिला प्रचारक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ

करते,विविध प्रकार के खेल खेलते,नये पुराने सभी स्वयं सेवकों का सर नेम विहीन परिचय होता था,पूर्वकाल वर्तमान और भविष्य काल के सामाजिक कार्यों एवं कर्तव्यों पर चर्चा करके भारत माता को विश्व के शिखर स्थान पर स्थापित करने की प्रार्थना करते हुए सभी स्वयं सेवक अपने आपको गौरवान्वित सा महसूस करते थे ! वन विहार और शरद पूर्णिमा जैसे कार्यक्रमों में बिना किसी भेदभाव के सह भोज हुआ करते थे,वर्ग प्रशिक्षणों में समता और समानता का आदर्श दिखाई देता था ! और यही मनः स्थिति सम्पूर्ण भारत में संघ की संचालित हजारों शाखाओं के लाखों स्वयंसेवकों की होती थी ! जिनके मन में जाति विहीन भेद भाव रहित समाज की स्थापना करके भारत में समता और समानता के आधार पर वैभवशाली राष्ट्र निर्माण की संकल्पना परिलक्षित होती थी,उसी आशा और विश्वास के साथ गुजरता समय चक्र चलता रहा,इसी क्रम में चलते 40 वर्षों का राष्ट्र प्रथम व हिन्दूओं के एकत्रीकरण की विचारधारा पर आधारित संघ परिवार की स्थापित नीतियों पर चलता रहा,यदि कभी किसी ने संघ परिवार पर कोई ओछी राजनीतिक बात की तो उसका कड़ा प्रतिरोध किया 15 जनवरी 2026 को जब मैंने यूजीसी एक्ट 2026 को पढ़ा तो उसे मैं समझ ही नहीं सका ! विश्वास ही नहीं कर सका कि भाजपा सरकार के सत्ता में रहते हुए किसी भी वर्ग एवं समाज के लिए अनहित कर सकने का सवाल ही पैदा नहीं हो सकता है,फिर सवर्ण वर्ग का वो अहित क्यों चाहेंगे ? मेरी इस टिप्पणी पर बहुत सारे मित्रों शुभचिंतकों ने प्रतिउत्तर देते हुए नई बनाई गई नई यूजीसी नीति के बहुत ही बारीक बिन्दुओं की ओर मेरा ध्यानाकर्षण कराया ! यूजीसी एक्ट 2026 की बारीकियों को समझकर ऐसा महसूस हुआ जैसे 40 वर्षों की मेरी संकल्प साधना कहीं तिनका तिनका होकर बिखर रही है ! मेरी समझ से परे था कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की ध्येय निष्ट साधना से निकल कर आये संघ की विचारधारा से प्रेरित,प्रशिक्षित और प्रचारक रहे कर्मठ व कट्टर राष्ट्रवादी स्वयं सेवक के द्वारा अपने प्रधानमंत्रित्व कार्यकाल में उच्च शिक्षण संस्थानों में ऐसी कोई एक पक्षीय नियमावली भी बन सकती है ! मेरे लिए तो यह नियमावली कल्पना से बाहर की बात थी ! ऐसा महसूस हुआ कि,संघ की शाखाओं और विभिन्न प्रशिक्षणों में जो बौधिक ज्ञान प्राप्त हुआ और वहां से जो भी सीखा जाना वह सब निर्थक है ! क्योंकि मुझे ऐसा महसूस हुआ कि अब हमारे मूल संगठन संघ की राजनीतिक शाखा भाजपा संघ की मूल विचारधारा सनातन हिन्दू धर्म के एकत्रीकरण के विपरीत जातीय विभाजन की दिशा में चल पड़ी है ! जहां अब राष्ट्र प्रथम नहीं सत्ता प्रथम हो गई है । संघ ने एक शताब्दी में जो कुछ हासिल करना था वो कर लिया है और अब सत्ता के लिए संघ के ही राजनीतिक विचार परिवार भाजपा ने पूर्व की विचारधारा से हटकर विपरीत विचारधारा का अनुसरण करने का मन शायद बना लिया है ! आजादी के 78 वर्षों बाद जब देश की राष्ट्रपति आदिवासी समुदाय से हैं,प्रधानमंत्री पिछड़ा वर्ग समुदाय से हैं,गृहमंत्री भी पिछड़ा वर्ग समाज से हैं,कानूनमंत्री दलित वर्ग समाज से हैं,शिक्षा मंत्री पिछड़ा पिछड़ा वर्ग समुदाय से हैं, दो सौ सांसद पिछड़ा वर्ग समाज से हैं,पचास सांसद दलित वर्ग समाज से हैं जिनमें से कई सांसद मंत्रिमंडल में सम्मानित मंत्री पद पर भी हैं ! न्यायपालिका व कार्यपालिका में भी दोनों वर्ग समुदाय दलित व पिछड़े वर्ग के हजारों लोग उच्च पदों पर भी कार्यरत हैं,भारत की स्वतंत्रता के 78 वर्षों बाद देश के तमाम मध्यम उच्च एवं सर्वोच्च पदों पर आसीन होनें के पश्चात भी यदि देश में अभी भी कोई शोषित वंचित शेष बचा है तो उनके उत्थान कल्याण की व्यवस्थाएं सरकारों को अवश्य ही सुनिश्चित करनी चाहिए ! लेकिन वर्षों वर्ष पुरानी सुनी सुनाई कहानियों के आधार पर अथवा एक आध अपवाद स्वरूप वर्तमान घटना को आधार मानकर वर्तमान में अभी भी सवर्ण वर्ग समाज को उत्पीड़ित करता शोषणकर्ता सिद्ध करना न्याय संगत नहीं बल्कि अन्याय है ! स्वतंत्रता से लेकर वर्तमान तक आरक्षण का निरंतर लाभ प्राप्त करने वाले वर्ग व समुदाय के लोग आगे भी पीढ़ी दर पीढ़ी आरक्षण का लाभ प्राप्त करने के लिए निरंतर हित साधने पर जुटे रहते हैं क्योंकि उन्हें किसी भी दशा में आरक्षण लाभ चाहिए ही चाहिए ! दलित एवं पिछड़े वर्ग को निरंतर आरक्षण का लाभ दिया जा रहा है,लेकिन अब वर्तमान में आकर सवर्ण वर्ग को जन्म जात शोषणकर्ता व उत्पीड़न कर्ता सिद्ध करके सवर्ण के दमन कराने की नई नीतियां बनाकर देश में समता समानता लाने की विचारधारा नहीं दिखती है ! बल्कि यह नव सृजित नई विचारधारा यूजीसी एक्ट 2026 जातीय विभाजन कराने की किसी नई योजना का हिस्सा दिखाई देती है । यूजीसी एक्ट 2026 लागू करने के बाद सवर्ण वर्ग द्वारा विरोध दर्ज कराने व आन्दोलित होने के बावजूद भारत सरकार की खामोशी व भाजपा के वरिष्ठ नेताओं की अनदेखी अनसुनी देखने के बाद उत्पीड़न किए जाने की आशंका के वशीभूत सवर्ण वर्ग समाज के कुछ लोगों ने सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा भी खटखटाया ! परिणामतः सर्वोच्च न्यायालय ने सुनवाई करके नये यूजीसी एक्ट 2026 पर स्थगनादेश देकर सवर्ण वर्ग को आंशिक राहत अवश्य प्रदान कर दी है लेकिन केन्द्र सरकार और यूजीसी को 19 मार्च तक जबाव दाखिल करने का नोटिस भी दिया है ! अर्थात इस मामले की गेंद अभी भी केन्द्र सरकार व यूजीसी के पाले में है ! लेकिन आगे आने वाला जबाव केन्द्र सरकार व यूजीसी के असली मकसद को अवश्य ही स्पष्ट कर देंगे कि यूजीसी द्वारा बनाई गई नियमावली 2026 कोई मानवीय भूल थी,य किसी अत्यन्त गम्भीर साजिश का परिणाम है ? जैसा कि कुछ लोग संसदीय समिति के अध्यक्ष पद पर दिग्विजय सिंह जी का होना व जस्टिस गवई जी के द्वारा समयबद्ध सुनवाई करने को लेकर बड़ी आशंका व्यक्त कर रहे हैं ! या फिर यह नियमावली केन्द्र सरकार एवं यूजीसी के द्वारा सोची समझी गहरी नीतियों का ही कोई हिस्सा है ! इन सारे संदेहों और आशंकाओं के बादलों का समाधान अब 19 मार्च 2026 को ही हो सकेगा ! उसी दिन यह भी तय हो जायेगा कि संघ के ही वैचारिक परिवार की एक राजनीतिक शाखा अपने ध्येय निष्ट मार्ग पर चल रही है य फिर मार्ग बदलकर नई विचारधारा का श्रजन कर रही है,19 मार्च 2026 तक अपने हितों के लिए चिंतित सवर्ण समाज के युवाओं व बुद्धिजीवी वर्ग को बड़े ही धैर्य एवं संयम के साथ उस दिन का इंतजार अब करना ही होगा ।
