
न्यूज स्टेटस 24, विवेक द्विवेदी । आस्था, राजनीति और प्रतीकों का इस्तेमाल वाराणसी में राहुल गांधी के जन्मदिन पर यूथ कांग्रेस कार्यकर्ताओं द्वारा उनके पोस्टर पर दूध और गंगाजल चढ़ाने तथा उन्हें भगवान परशुराम के स्वरूप में प्रस्तुत करने की घटना ने नई बहस छेड़ दी है।भारतीय संस्कृति में दूध और गंगाजल का प्रयोग सामान्यतः देवी-देवताओं के अभिषेक, पूजा-अर्चना और धार्मिक अनुष्ठानों में किया जाता है। ऐसे में किसी जीवित राजनीतिक नेता के पोस्टर पर दूध और गंगाजल चढ़ाना कई लोगों की धार्मिक भावनाओं और परंपरागत मान्यताओं के संदर्भ में प्रश्न खड़े कर सकता है। आलोचकों का कहना है कि राजनीतिक व्यक्तित्वों को धार्मिक प्रतीकों के समान स्थापित करने की प्रवृत्ति लोकतांत्रिक संस्कृति की बजाय व्यक्तिपूजा को बढ़ावा देती है।दूसरी ओर कांग्रेस समर्थक इसे सम्मान और शुभकामना व्यक्त करने का एक प्रतीकात्मक तरीका बता सकते हैं। भारत की राजनीति में नेताओं के पोस्टर पर दुग्धाभिषेक, माल्यार्पण और विशेष धार्मिक प्रतीकों का उपयोग कोई नई बात नहीं है। विभिन्न दलों के समर्थक समय-समय पर अपने नेताओं के प्रति श्रद्धा प्रदर्शित करने के लिए ऐसे आयोजन करते रहे हैं।जहां तक राहुल गांधी को भगवान परशुराम के स्वरूप में दिखाने और उनके हाथ में फरसा तथा संविधान की प्रति देने का सवाल है, इसे राजनीतिक संदेश के रूप में भी देखा जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का एक वर्ग मानता है कि यह ब्राह्मण समाज को संदेश देने का प्रयास हो सकता है, विशेषकर ऐसे समय में जब उत्तर प्रदेश सहित कई राज्यों में विभिन्न जातीय समूहों का समर्थन हासिल करने की प्रतिस्पर्धा तेज है। हालांकि कांग्रेस की ओर से इसे आधिकारिक तौर पर ब्राह्मण वोट बैंक की राजनीति बताने वाला कोई बयान सामने नहीं आया है।लोकतंत्र में नेताओं का सम्मान होना चाहिए, लेकिन धार्मिक आस्था और राजनीतिक प्रचार के बीच की रेखा भी स्पष्ट रहनी चाहिए। सवाल यही है कि क्या राजनीतिक दलों को वोट और समर्थन के लिए धार्मिक प्रतीकों का इस्तेमाल करना चाहिए, या फिर विकास, नीति और जनहित के मुद्दों पर राजनीति को केंद्रित रखना चाहिए? यही बहस इस पूरे घटनाक्रम के केंद्र में है।News Status 24 , पूरी करे सच की जिज्ञासा ।
