
विनय निगम, न्यूज स्टेटस 24,ब्यूरो चीफ बुंदेलखंड बांदा।बांदा जिले की बबेरू विधानसभा क्षेत्र की राजनीति में इन दिनों हलचल तेज है। समाजवादी पार्टी की सांसद कृष्णा देवी शिवशंकर पटेल और उनके समर्थकों को लेकर चल रही राजनीतिक बयानबाजी ने क्षेत्रीय राजनीति में नए समीकरणों की चर्चाओं को जन्म दे दिया है। खासकर अवैध खनन और पर्यावरणीय मुद्दों पर सांसद की सक्रियता के बाद पार्टी के भीतर मतभेदों की खबरें सामने आ रही हैं।राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि पिछले कुछ महीनों से सांसद कृष्णा देवी पटेल को लेकर सोशल मीडिया और विभिन्न मंचों पर लगातार सवाल उठाए जा रहे हैं। सांसद समर्थकों का आरोप है कि यह एक सुनियोजित राजनीतिक अभियान का हिस्सा है, जबकि विरोधी पक्ष सांसद और उनके परिवार की कार्यशैली पर सवाल खड़ा कर रहा है। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है।हाल के दिनों में सांसद कृष्णा देवी पटेल ने जिले में अवैध खनन और पर्यावरणीय क्षति के मुद्दे को प्रमुखता से उठाया था। इसके बाद राजनीतिक बयानबाजी और तेज हो गई। विरोधियों की ओर से सांसद के पति एवं पूर्व मंत्री शिवशंकर सिंह पटेल पर भी विभिन्न आरोप लगाए गए, जबकि उनके समर्थकों ने इन आरोपों को राजनीतिक द्वेष से प्रेरित बताया है।राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार बबेरू विधानसभा क्षेत्र में यादव और पटेल (कुर्मी) समाज लंबे समय से प्रभावशाली राजनीतिक ताकत रहे हैं। क्षेत्र में दलित, मुस्लिम और अन्य पिछड़ा वर्ग भी चुनावी परिणामों को प्रभावित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।स्वतंत्रता के बाद से बबेरू विधानसभा का राजनीतिक इतिहास कई उतार-चढ़ावों का साक्षी रहा है। कांग्रेस, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, भाजपा, बसपा और समाजवादी पार्टी सभी यहां अपनी उपस्थिति दर्ज करा चुकी हैं। वर्ष 1996 में शिवशंकर सिंह पटेल ने भाजपा के टिकट पर जीत दर्ज कर क्षेत्रीय राजनीति में मजबूत पहचान बनाई थी। इसके बाद विभिन्न चुनावों में अलग-अलग दलों और सामाजिक समूहों का प्रभाव देखने को मिला।2022 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी के विश्वंभर सिंह यादव ने जीत दर्ज कर सपा की वापसी कराई थी। वहीं 2024 के लोकसभा चुनाव में कृष्णा देवी शिवशंकर पटेल के सांसद बनने के बाद क्षेत्र में राजनीतिक गतिविधियां और तेज हो गईं। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इससे बबेरू के पारंपरिक राजनीतिक समीकरणों में बदलाव की चर्चा शुरू हुई है।सूत्रों के अनुसार सांसद समर्थकों में यह भावना है कि उन्हें पार्टी के भीतर अपेक्षित सम्मान नहीं मिल रहा है, जबकि दूसरी ओर विरोधी खेमा उनकी कार्यशैली को लेकर सवाल उठा रहा है। यही वजह है कि दोनों पक्षों के बीच दूरी बढ़ती दिखाई दे रही है।2027 के विधानसभा चुनाव से पहले बबेरू की राजनीति में यह घटनाक्रम महत्वपूर्ण माना जा रहा है। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि यदि मतभेद बढ़ते हैं तो इसका असर स्थानीय चुनावी रणनीतियों और सामाजिक समीकरणों पर पड़ सकता है। फिलहाल क्षेत्र में राजनीतिक सरगर्मी बढ़ी हुई है और सभी की निगाहें आने वाले दिनों की गतिविधियों पर टिकी हैं।(समाचार में उल्लिखित आरोप और दावे संबंधित पक्षों तथा राजनीतिक सूत्रों पर आधारित हैं। इनकी स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है।)
