
अरविंद दुबे , प्रदेश महामंत्री सहकार भारती( उ प्र )
पश्चिम बंगाल की राजनीति में भारतीय जनता पार्टी ने जिस तरह अपनी मौजूदगी दर्ज कराई है, उसे राज्य की सियासत में बड़ा बदलाव माना जा रहा है। दशकों तक वाम दलों और फिर तृणमूल कांग्रेस के वर्चस्व वाले इस प्रदेश में भाजपा का तेजी से उभार केवल चुनावी आंकड़ों का खेल नहीं, बल्कि राजनीतिक ध्रुवीकरण और रणनीतिक विस्तार का परिणाम है। Bharatiya Janata Party ने सीमित उपस्थिति से निकलकर मुख्य मुकाबले की स्थिति तक पहुंचते हुए परंपरागत समीकरणों को चुनौती दी है।इस बदलाव के पीछे राष्ट्रीय नेतृत्व की आक्रामक रणनीति को अहम माना जा रहा है। प्रधानमंत्री Narendra Modi और गृहमंत्री Amit Shah ने लगातार बंगाल में रैलियों और संगठनात्मक बैठकों के जरिए पार्टी को मजबूती दी, जिससे चुनावी मुकाबला सीधे तौर पर Mamata Banerjee और भाजपा के बीच केंद्रित हो गया। इस सीधी टक्कर ने चुनाव को राष्ट्रीय बनाम क्षेत्रीय नेतृत्व की लड़ाई का रूप भी दिया।भाजपा ने बंगाल में सांस्कृतिक और धार्मिक मुद्दों को भी प्रमुखता से उठाया। दुर्गा पूजा, जय श्रीराम जैसे नारों और सीमा सुरक्षा व घुसपैठ के मुद्दों को चुनावी विमर्श में लाकर पार्टी ने एक खास मतदाता वर्ग को प्रभावित करने की कोशिश की। इसका असर खासकर सीमावर्ती इलाकों और शहरी क्षेत्रों में देखने को मिला।संगठन के स्तर पर भी भाजपा ने तेजी से काम किया। बूथ स्तर तक नेटवर्क खड़ा करने, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सहयोग और अन्य दलों से आए नेताओं को शामिल करने से पार्टी को जमीनी मजबूती मिली। वहीं, तृणमूल कांग्रेस के खिलाफ स्थानीय स्तर पर उठे भ्रष्टाचार और “कट मनी” जैसे आरोपों ने सत्ता विरोधी माहौल बनाने में भूमिका निभाई, जिसका सीधा फायदा भाजपा को मिला।सीधा जवाब यह है कि इसे “या तो यह, या वह” की तरह देखना थोड़ा सरल कर देना होगा—बंगाल में भाजपा के उभार के पीछे हिंदुत्व का असर भी था और Mamata Banerjee सरकार के खिलाफ असंतोष भी। दोनों ने मिलकर माहौल बनाया।भाजपा ने जिस तरह सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान को चुनावी विमर्श में लाया—जय श्रीराम, दुर्गा पूजा, और सीमा सुरक्षा जैसे मुद्दों के जरिए—उसने खासकर उन इलाकों में असर डाला जहां पहचान की राजनीति पहले इतनी तेज नहीं थी। Bharatiya Janata Party ने इसे केवल धार्मिक मुद्दा नहीं, बल्कि “सांस्कृतिक अस्मिता” के रूप में पेश किया, जिससे एक नया वोट बैंक जुड़ा। उधर यहां दूसरा बड़ा फैक्टर था सत्ता विरोधी माहौल। स्थानीय स्तर पर “कट मनी”, भ्रष्टाचार, और कार्यकर्ताओं की दबंगई जैसे आरोपों ने All India Trinamool Congress के खिलाफ नाराजगी पैदा की। ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में यह असंतोष काफी गहरा था, जिसका फायदा भाजपा को मिला।इसके अलावा भाजपा ने संगठन पर भी भारी काम किया—बूथ मैनेजमेंट, दूसरे दलों के नेताओं को शामिल करना, और लगातार जमीनी उपस्थिति। साथ ही Narendra Modi और Amit Shah की हाई-इंटेंसिटी कैंपेनिंग ने चुनाव को राष्ट्रीय स्तर की लड़ाई बना दिया। वही ममता सरकार में त्रस्त हिंदू वोट बैंक भी ऐतिहासिक जीत दिलाने में कारगर हुआ ।इसलिए सही विश्लेषण यह होगा कि हिंदुत्व “ट्रिगर” था, लेकिन “ईंधन” एंटी-इंकंबेंसी और संगठनात्मक ताकत थी। सिर्फ एक कारण से इतनी बड़ी राजनीतिक बढ़त नहीं मिलती—यह कई कारकों का मिला-जुला परिणाम था। News Status 24 , पूरी करे सच की जिज्ञासा ….. विवेक द्विवेदी, संपादक
