
हर साल परीक्षा का मौसम आते ही लाखों छात्र मानसिक तनाव के दौर से गुजरते हैं। किताबों का बोझ नहीं, बल्कि उम्मीदों का दबाव उन्हें भीतर से तोड़ने लगता है। अच्छे नंबर लाने की होड़, परिवार की अपेक्षाएं और “भविष्य बन जाएगा या बिगड़ जाएगा” जैसी सोच छात्रों को अनजाने में अवसाद की ओर धकेल देती है।यह विडंबना ही है कि हम बच्चों को पढ़ाना तो सिखाते हैं, लेकिन उन्हें तनाव से लड़ना नहीं सिखाते।आज की शिक्षा व्यवस्था में सफलता को केवल अंकों से मापा जा रहा है। नतीजा यह है कि छात्र खुद को मशीन समझने लगते हैं — लगातार पढ़ाई, लगातार तुलना और लगातार डर। जबकि सच्चाई यह है कि परीक्षा केवल ज्ञान का मूल्यांकन है, जीवन का फैसला नहीं।विशेषज्ञ मानते हैं कि तनाव का सबसे बड़ा कारण अव्यवस्थित दिनचर्या है। बिना योजना पढ़ाई करना, रात-रात भर जागना और अंतिम समय में सब कुछ रटने की कोशिश मानसिक संतुलन बिगाड़ देती है। जरूरत है संतुलित टाइम-टेबल, पर्याप्त नींद और स्वस्थ खान-पान की।सबसे खतरनाक है तुलना की प्रवृत्ति। “फलां ने इतना पढ़ लिया”, “वह मुझसे आगे है” — यही सोच आत्मविश्वास की जड़ काट देती है। हर छात्र की क्षमता अलग होती है, इसे स्वीकार करना ही मानसिक मजबूती की पहली सीढ़ी है।योग, ध्यान और सकारात्मक सोच को अक्सर हल्के में लिया जाता है, जबकि यही मानसिक स्थिरता के सबसे मजबूत स्तंभ हैं। रोज़ कुछ मिनट खुद के लिए निकालना किसी विलासिता नहीं, बल्कि जरूरत है।सबसे अहम बात — बच्चों को बोलने का मौका मिलना चाहिए। जब छात्र अपनी घबराहट साझा करते हैं, तो आधी समस्या वहीं खत्म हो जाती है। माता-पिता और शिक्षकों की भूमिका केवल परिणाम पूछने तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि भावनात्मक सहारा देना भी उतना ही जरूरी है।समाज को यह समझना होगा कि परीक्षा जीवन का पड़ाव है, मंज़िल नहीं। अंक भविष्य की दिशा तय कर सकते हैं, लेकिन जीवन की कीमत नहीं।अब वक्त आ गया है कि हम सफल बच्चों से ज्यादा स्वस्थ और आत्मविश्वासी बच्चे तैयार करें।
